Annantaa और ECA की पहल पर एंटी-बुलिंग कॉन्क्लेव

कोलकाता के प्रमुख शिक्षाविदों को एक मंच पर लाकर सुरक्षित विद्यालयों के निर्माण का संदेश

कोलकाता, 1 सितंबर, 2026: बुलिंग अथवा सहपाठियों द्वारा मानसिक उत्पीड़न हमेशा मारपीट या खुले तौर पर डराने-धमकाने जैसे दृश्यमान रूप में सामने नहीं आता। कभी-कभी यह किसी बच्चे के धीरे-धीरे शांत हो जाने, विद्यालय जाने से बचने अथवा क्रमशः आत्मविश्वास खोने के रूप में दिखाई देता है। बुलिंग के इसी अपेक्षाकृत अदृश्य पक्ष को केंद्र में रखते हुए Annantaa ने Early Childhood Association (ECA) के सहयोग से ‘Safe Schools, Stronger Minds’ शीर्षक से एंटी-बुलिंग कॉन्क्लेव का आयोजन किया। इस सम्मेलन में शिक्षाविदों तथा मानसिक-स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने एकत्रित होकर इस बात पर विचार-विमर्श किया कि विद्यालय ऐसे संकेतों की शीघ्र पहचान कैसे कर सकते हैं, संवेदनशीलता के साथ परिस्थितियों का सामना कैसे कर सकते हैं तथा ऐसा वातावरण कैसे निर्मित कर सकते हैं, जहाँ बच्चे निर्भीक होकर अपनी समस्याओं के बारे में बात कर सकें।
इस विमर्श में कोलकाता के शिक्षा-जगत के अनेक विशिष्ट प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें La Martiniere for Girls School की प्रिंसिपल रूपकथा सरकार; Birla High School, Mukundapur की प्रिंसिपल जेसिका गोमेस सुराना; SPK Jain Futuristic Academy की प्रिंसिपल डॉ. जयिता गंगोपाध्याय; The Newtown School की प्रिंसिपल शताब्दी भट्टाचार्य; DPS Barasat की प्रिंसिपल जयिता मजूमदार; The Shri Shikshayatan School की प्रिंसिपल संगीता टंडन; तथा EuroKids Preschool Ballygunge एवं Cocoon Daycare & Activity Centre, Ballygunge की प्रिंसिपल एवं स्वामिनी ऋतुपर्णा कलॉय शामिल थीं। इसके अतिरिक्त B. D. Memorial Jr. की Director & Principal, IVWS एवं B.D.M.I. की Advisor तथा ECA की National Core Committee Member डॉ. सुमन सूद भी उपस्थित थीं।
यह कॉन्क्लेव बच्चों के मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य से संबंधित Annantaa के व्यापक प्रयासों का प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है। इसमें प्रारंभिक चरण में समस्याओं की पहचान, समयोचित हस्तक्षेप तथा भावनात्मक रूप से सहायक वातावरण के निर्माण पर विशेष बल दिया गया। ‘Safe Schools, Stronger Minds’ के माध्यम से शिक्षाविदों ने अपने अनुभव साझा किए और विद्यालयों में बुलिंग से निपटने के प्रभावी एवं व्यावहारिक उपायों पर चर्चा की। विमर्श का केंद्रीय संदेश स्पष्ट था—सुरक्षित विद्यालय केवल नियम-कानूनों के माध्यम से निर्मित नहीं होते; इसके लिए परस्पर विश्वास, संवेदनशील एवं प्रभावी व्यवस्थाओं तथा ऐसी संस्कृति की आवश्यकता होती है, जहाँ प्रत्येक बच्चा स्वयं को सुना गया, समर्थित और सुरक्षित महसूस करे।
कॉन्क्लेव के केंद्रीय पैनल विमर्श का विषय था—“From Awareness to Action: How Schools Can Recognise, Respond to and Prevent Bullying”। अर्थात विद्यालय जागरूकता से प्रभावी कार्रवाई की दिशा में कैसे आगे बढ़ सकते हैं तथा बुलिंग की पहचान, उसके प्रतिरोध और निवारण के लिए क्या कदम उठा सकते हैं। चर्चा में प्रारंभिक स्तर पर समस्या की पहचान, संवेदनशील प्रतिक्रिया तथा स्पष्ट प्रबंधन-व्यवस्था पर विशेष जोर दिया गया। साथ ही बच्चों की बात ध्यानपूर्वक सुनने तथा उनकी चिंताओं के संकेतों की पहचान करने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित किया गया।
बचपन के प्रारंभिक चरण से ही सहानुभूति, पारस्परिक सम्मान तथा मतभेदों से निपटने के स्वस्थ तरीकों के विकास पर भी विशेष बल दिया गया। इसके परिणामस्वरूप मजाक-उपहास, सामाजिक बहिष्कार अथवा मतभेदों को बड़ी समस्या का रूप लेने से पहले ही प्रभावी ढंग से संबोधित किया जा सकता है।
कोलकाता के संदर्भ में भी यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोलकाता के दो उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के 254 विद्यार्थियों पर किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले विद्यार्थियों में 10.5 प्रतिशत साइबरबुलिंग के शिकार हुए थे। प्रभावित विद्यार्थियों में 72.7 प्रतिशत के पास इस परिस्थिति से निपटने के लिए कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं थी, जबकि 68.2 प्रतिशत ने सहायता के लिए अपने मित्रों का सहारा लिया—जो इस प्रकार की घटनाओं के अनकहे एवं अप्रकाशित रह जाने की संभावना की ओर संकेत करता है।
कोलकाता के किशोर-किशोरियों पर किए गए एक अलग अध्ययन में पाया गया कि 18.6 प्रतिशत ने बुलिंग अथवा मजाक-उपहास जैसी मानसिक हिंसा का अनुभव किया है। हाल के समय में पश्चिम बंगाल के विद्यालयों में NCERT के एक मूल्यांकन में पाया गया कि 30 प्रतिशत विद्यार्थियों ने सहपाठियों द्वारा मजाक उड़ाए जाने की बात कही, 23 प्रतिशत ने समूहगत गतिविधियों से बाहर किए जाने की जानकारी दी और 19 प्रतिशत विद्यार्थियों ने बताया कि वे विद्यालय में स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करते। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि विद्यालयों की जिम्मेदारी केवल बुलिंग की पहचान तक सीमित नहीं है; उन्हें ऐसा सुरक्षित वातावरण भी निर्मित करना होगा, जहाँ बच्चे सहजतापूर्वक अपने अनुभव साझा कर सकें और सहायता मांग सकें।
बुलिंग के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण समस्या इसके चारों ओर निर्मित मौन है। आलोचना या निर्णय का सामना करने का भय, शर्मिंदगी अथवा परिस्थिति और अधिक बिगड़ जाने की आशंका के कारण अनेक बच्चे सहायता मांगने के लिए आगे नहीं आते। कॉन्क्लेव में psychological safety अर्थात मानसिक सुरक्षा के महत्व को रेखांकित किया गया—ऐसी स्थिति, जिसमें विद्यार्थी यह विश्वास कर सकें कि अपनी बात सामने रखने पर उन्हें दोषारोपण अथवा सामाजिक अलगाव का सामना नहीं करना पड़ेगा, बल्कि सहयोग एवं समर्थन प्राप्त होगा।
इसके लिए विश्वास पर आधारित संबंधों, सहज एवं सुलभ शिकायत-प्रणाली तथा ऐसे वयस्कों की आवश्यकता है, जो बच्चों की बात सहानुभूतिपूर्वक सुन सकें। इसलिए एंटी-बुलिंग पहल को विद्यालयी समुदाय को अधिक सुरक्षित, दृश्यमान, गरिमापूर्ण और सहयोगी बनाने की व्यापक प्रतिबद्धता के एक अभिन्न अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।
कॉन्क्लेव में वक्तव्य देते हुए Annantaa की संस्थापक, Counselling Psychologist एवं Clinical Hypnotherapist माधुरी सरदा ने कहा,
“बुलिंग हमेशा दृश्यमान नहीं होती; कभी-कभी यह बच्चे की चुप्पी, स्वयं में सिमट जाने अथवा आत्मविश्वास खो देने के माध्यम से प्रकट होती है। वयस्कों के रूप में हमें इन संकेतों को पहचानना होगा, बिना किसी निर्णय या पूर्वाग्रह के बच्चों की बात सुननी होगी और ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जहाँ वे निर्भीक होकर अपनी बात कह सकें। ‘Safe Schools, Stronger Minds’ के माध्यम से हम चाहते हैं कि विद्यालय बुलिंग को केवल अनुशासन संबंधी समस्या के रूप में न देखें, बल्कि ऐसे विषय के रूप में समझें, जिसका बच्चे के भावनात्मक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।”
कॉन्क्लेव में B. D. Memorial Jr. की Director & Principal, IVWS एवं B.D.M.I. की Advisor तथा ECA की National Core Committee Member डॉ. सुमन सूद ने कहा,
“Annantaa और ECA का यह सहयोग मानसिक स्वास्थ्य एवं शिक्षा के क्षेत्र के दृष्टिकोणों को एक साथ लाकर बुलिंग जैसी समस्या से अधिक सार्थक ढंग से निपटने का अवसर प्रदान करता है। शिक्षाविदों को इस चर्चा का हिस्सा बनाकर हम ऐसे विद्यालयी वातावरण के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं, जहाँ बच्चे सुरक्षित, सम्मानित तथा अपनी बात रखने के प्रति आत्मविश्वास से परिपूर्ण महसूस करें। इस प्रकार की चर्चाएँ अधिक सशक्त और सहयोगी विद्यालयों के निर्माण की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम हैं।”
सुरक्षित विद्यालय के निर्माण की शुरुआत ऐसे वातावरण के सृजन से होती है, जहाँ बच्चे स्वाभाविक रूप से स्वयं को अभिव्यक्त करने में सहज महसूस करें। ‘Safe Schools, Stronger Minds’ ने स्पष्ट किया कि बुलिंग की रोकथाम किसी एक कार्यशाला, पोस्टर अथवा नीति-निर्धारण तक सीमित नहीं रह सकती। इसके बजाय सहानुभूति, समावेशन, पारस्परिक विश्वास तथा त्वरित एवं संवेदनशील सहायता के माध्यम से इसे विद्यालय की दैनिक संस्कृति का अभिन्न अंग बनाना होगा।
जब बच्चों को यह विश्वास होता है कि उनकी बात सुनी जाएगी, उनका सम्मान किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर उनके साथ खड़ा हुआ जाएगा, तब विद्यालय केवल बुलिंग की घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने का स्थान नहीं रह जाता—बल्कि वह ऐसी स्वस्थ संस्कृति का निर्माण करता है, जहाँ बुलिंग के पनपने की संभावना ही काफी हद तक कम हो जाती है।
चित्र परिचय — बाएँ से दाएँ
रूपकथा सरकार, Principal, La Martiniere for Girls School
नीता कानोरिया, Director and Principal, Wings Preschool, Daycare and Activity Centre
डॉ. सुमन सूद, Director & Principal, B. D. Memorial Jr.; Advisor, IVWS & B.D.M.I.; National Core Committee Member, ECA
डॉ. जयिता गंगोपाध्याय, Principal, SPK Jain Futuristic Academy
जेसिका गोमेस सुराना, Principal, Birla High School, Mukundapur
ऋतुपर्णा कलॉय, Principal & Owner, EuroKids Preschool Ballygunge; Cocoon Daycare & Activity Centre, Ballygunge
जयिता मजूमदार, Principal, DPS Barasat
शताब्दी भट्टाचार्य, Principal, The Newtown School
परमिता घोष, Moderator of the Session; Founder-Director, Candid by Paromita
माधुरी सरदा, Counselling Psychologist and Clinical Hypnotherapist; Founder, Annantaa
विधि बंसल, Co-Founder and Psychotherapist, Annantaa

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